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केंद्र

ये जगमंडल का है प्रभाव
शोषित है तन मन का प्रयाग
है नही केंद्र, पथ भ्रष्ट बहाव
ये जगमंडल  का है प्रभाव
अर्जित कर ऊर्जा... इतनी मन में
तू ही हो नाविक, तेरी हो नाव
ये जगमंडल का है प्रभाव
धार बहे , जो कहना इक बार कहे !
सृजित करो !
उलटी धारा , अब ! बहुत बही
बढ़ कर श्रृष्टि तुम विजित करो !

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रूबरू

ये शायर जब भी लिखता है, शब्दों के मोती पीरो के लिखता है  इस मोती के गहने की कीमत बेमोल है बाजारों में, जिस हुस्न की ये फरमाइश हुयी, उस नूर में चाँद का अक्स दिखता है  । कहाँ मियां किस ख्याल में हो, किसने कहा कि ये जनरेशन 'कबीर' ढूंढती है  अब तो बस एक खींची हुई लकीर ढूंढती है !  #TikkaBhaat टाटा बिड़ला के कारखाने से कमाए पैसे मकान बनाते हैं,  केजीपी आओ, यहाँ हम इंसान बनाते हैं ! #Convo2013

कल्पतरु

अब चाणक्य की शिखा नही न 'कल्पतरु' का सेज है पुष्प वृन्द के भ्रमर यहाँ न शाश्वत सत्य का तेज है !! मूर्त भाव का पूजन है दंभ भाव का गर्जन है शीश यहाँ ...आशीष नहीं मुंड यहाँ ..मानव मन है कहीं !! बस एक हस्त ही उठता है चाहें सहस्त्र प्रलाप करें !! मुख सूर्य-दीप्ति ही रखता है जग झूठा क्यूँ न संताप करे !! 'कल्पतरु' बन विकट समय भी.. न्याय नीति की छाँव करूं सुयश प्रभा हो सत्य भाव की अग्नि दहन कर दंभ हरूँ !!!

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