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कल्पतरु

अब चाणक्य की शिखा नही
न 'कल्पतरु' का सेज है
पुष्प वृन्द के भ्रमर यहाँ
न शाश्वत सत्य का तेज है !!

मूर्त भाव का पूजन है
दंभ भाव का गर्जन है
शीश यहाँ ...आशीष नहीं
मुंड यहाँ ..मानव मन है कहीं !!

बस एक हस्त ही उठता है
चाहें सहस्त्र प्रलाप करें !!
मुख सूर्य-दीप्ति ही रखता है
जग झूठा क्यूँ न संताप करे !!

'कल्पतरु' बन विकट समय भी..
न्याय नीति की छाँव करूं
सुयश प्रभा हो सत्य भाव की
अग्नि दहन कर दंभ हरूँ !!!

Comments

  1. मूर्त भाव का पूजन है
    दंभ भाव का गर्जन है

    Thats nice Dubey!!

    ReplyDelete

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