Skip to main content

नव -निर्माण

नव -निर्माण
भार - विहीन
है धड़ निरीह
मन चंचल 'कब ?'
सोच रहा |

अंकुर फूटे
नव -सृजन गमन को
कुछ कर डालो अब बोल रहा |

हो धरा सृजित
कर्म -कलुष विजित
शुभ प्रहर रहे,हो अच्छा वर्ष
जन-जीवन में फैले उत्कर्ष |

नव-वर्ष हो सिंचित प्रेम,पर्व और आशा से
मैं  रहूँ कृतज्ञ 
न  नाता  हो किंचित घोर निराशा से |

Comments

Popular posts from this blog

रूबरू

ये शायर जब भी लिखता है, शब्दों के मोती पीरो के लिखता है  इस मोती के गहने की कीमत बेमोल है बाजारों में, जिस हुस्न की ये फरमाइश हुयी, उस नूर में चाँद का अक्स दिखता है  । कहाँ मियां किस ख्याल में हो, किसने कहा कि ये जनरेशन 'कबीर' ढूंढती है  अब तो बस एक खींची हुई लकीर ढूंढती है !  #TikkaBhaat टाटा बिड़ला के कारखाने से कमाए पैसे मकान बनाते हैं,  केजीपी आओ, यहाँ हम इंसान बनाते हैं ! #Convo2013

कल्पतरु

अब चाणक्य की शिखा नही न 'कल्पतरु' का सेज है पुष्प वृन्द के भ्रमर यहाँ न शाश्वत सत्य का तेज है !! मूर्त भाव का पूजन है दंभ भाव का गर्जन है शीश यहाँ ...आशीष नहीं मुंड यहाँ ..मानव मन है कहीं !! बस एक हस्त ही उठता है चाहें सहस्त्र प्रलाप करें !! मुख सूर्य-दीप्ति ही रखता है जग झूठा क्यूँ न संताप करे !! 'कल्पतरु' बन विकट समय भी.. न्याय नीति की छाँव करूं सुयश प्रभा हो सत्य भाव की अग्नि दहन कर दंभ हरूँ !!!

कविता का अलाव

मष्तिष्क में छाये धुंध को हटाने को  खुद को कविता-लेखन की पटरी पर लाने को  ये प्रस्तुति कविता रुपी अलाव का हवन है  आखिरकार शरीर भी कोशिकाओं का भवन है  धुंध जैसे जल का एक स्वरुप है  मानव अंग भी कोशिकाओं का भिन्न भिन्न प्रारूप है  इस कविता को तर्क-वितर्क के तराजू पर मत तौलिये  क्योंकि बहुत दिन के उपरान्त ये एक अभिनव प्रयास है  इस कर्मठ के पूर्व अगणित दिवसों का अवकाश है  रोज़मर्रा घटित होती घटनाएं, लेखन का अवसर देती हैं  ठीक समय पर न सचेत हों, तो ज़िन्दगी भी 'कह कर लेती है' इस लेख में आप अंग्रेजी का मिश्रण कम पाएंगे  और German (तृतीय भाषा) खोजने के लिए CBI का भूत लगाएंगे  चूंकि ये खाटी हिंदी में तैयार देशी व्यंजन है  इसका भाव वही समझे जो 'Pure Lit Vegan' है  आपसे एक गुज़ारिश है  एक छोटी सी शिफारिश है  ये कविता एक लय-ताल की बहती धारा है  इसका मूल 'Go with the flow' का प्रचलित नारा है  फिर भी हम भी कितना भी फ्लो में जाते हैं...